Corona Virus Par Ek Hadees Ka Galat Mafhoom Or Uska Jawab

*🔰कोरोना वायरस पर एक हदिष का गलत मफ़हूम निकलना🔰*
(उर्दू से हिंदी ट्रांसलेट)

*🌹सवाल*
اَلسَلامُ عَلَيْكُم وَرَحْمَةُ اَللهِ وَبَرَكاتُهُ‎
एक मुफ़्ती साहब की तहरीर मिली जिस में उन्होंने एक हदिष बयान की वो हदिष ये हे “हजरत अबू हुरैरा رَضِیَ اللہُ تَعَالٰی عَنْہُ का बयान हे के रसूलल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: अन करीब फ़ित्ना ज़ाहिर होगा, उन में बैठने वाला खड़े रहने वाले से बहतर होगा और खड़ा रहने वाला चलने वाले से बेहतर होगा, और चलने वाला दौड़ ने वाले से बेहतर होगा। जो इन फ़ित्नों को देखेगा वो फ़ित्ने खुद उसे देख लेंगे , और जिस शख्स को उन से पनाह की जगह मिल जाये वो पनाह हासिल करले.

इस हदिष के बाद मुफ़्ती साहब ने ये कहा कि हदिष में फ़ित्ना का माना बलाएँ यानी कोरोना वायरस हे। क्या ये सहीह हे.
साईल: पठान मोइन रज़ा, पेटलाद गुजरात

*🌹अल जवाब*

وَعَلَيْكُم السَّلَام وَرَحْمَةُ اَللهِ وَبَرَكاتُهُ‎
यहाँ फ़ित्ने से मुराद मुसल्मानो में बाहमी खूं रेज़ी और कत्लो किताल वाला फ़ित्ना हे. चुनान्चे मुस्लिम शरीफ में हदिषे मज़कूर के बाद वाली हदिष में सराहत वारिद हे और एक हदिष दूसरी हदिष की तफ़्सीर हुवा करती है.
*قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ” إنها ستكون فتن: ألا ثم تكون فتنة القاعد فيها خير من الماشي فيها، والماشي فيها خير من الساعي إليها. ألا، فإذا نزلت أو وقعت، فمن كان له إبل فليلحق بإبله، ومن كانت له غنم فليلحق بغنمه، ومن كانت له أرض فليلحق بأرضه ” قال فقال رجل: يا رسول الله أرأيت من لم يكن له إبل ولا غنم ولا أرض؟ قال: «يعمد إلى سيفه فيدق على حده بحجر، ثم لينج إن استطاع النجاء، اللهم هل بلغت؟ اللهم هل بلغت؟ اللهم هل بلغت؟» قال: فقال رجل: يا رسول الله أرأيت إن أكرهت حتى ينطلق بي إلى أحد الصفين، أو إحدى الفئتين، فضربني رجل بسيفه، أو يجيء سهم فيقتلني؟ قال: «يبوء بإثمه وإثمك، ويكون من أصحاب النار»،*
यानी अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया कि बे शक अनक़रीब फ़ित्ने रोनुमा होंगे. सुनो ! उस में बैठे रहने वाला चलने वाले से और चलने वाला कोशिश करने वाले से बेहतर होगा। सुनो ! जब वो फ़ित्ने नाज़िल हों या (हुज़ूर ने फ़रमाया कि वाक़ेअ हों) तो जिस के ऊंट हों वो अपने ऊंट से जा मिले और जिस की बकरियाँ हों वो अपनी बकरियों में आ मिले और जिस की ज़मीन हो वो अपनी ज़मीन में चला जाये । एक शख्स ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह ﷺ ! जिस के ऊंट न हो न बकरियाँ हों न ज़मीन, वो क्या करे ? हुज़ूर ने फ़रमाया कि वो अपनी तलवार ले कर उस की धार पथ्थर से कूट दे फिर रिहाई पा सकता है तो पाये फिर हुज़ूर ने फ़रमाया कि खुदाया ! यक़ीनन मैंने तेरा पैगाम पहुँचा दिया, हुज़ूर ने तीन बार फ़रमाया फिर एक शख्स ने अर्ज़ किया कि गफ नाचार मुझे दोनों फौजो में किसी एक फ़ौज की तरफ ढकेल दिया जाये और कोई मुझ पर तलवार चलाये या तीर फेंके और में हलाक हो जाऊं तो ? हुज़ूर ने फ़रमाया कि वो अपने गुनाह और तेरे गुनाह दोनों का वबाल ले कर लौटेगा और जहन्नम में जायेगा.

ओर मिरकातुल मफातिह में हाकिम के हवाले से एक इर हदिष हुज़ूर मुफती साहब किब्ला की पेश कर्दा हदिष के आखर में ज़िक्र की गई:
*روى الحاكم عن خالد بن عرفطة: ستكون أحداث وفتنة وفرقة واختلاف، فإن استطعت أن تكون المقتول لا القاتل فافعل* .

यानी अनक़रीब कुछ हवादिस, तवाईफूल मुल्की और इख़्तेलाफात रोनुमा होंगे, अगर तूझ से हो सके तो क़त्ल हो जाये मगर क़त्ल न करे तो तू कर…

हाँ ! इस में इख़्तेलाफ़ हे की तमाम जंगे मुराद हें या मुराद वो मख़्सूस जंगें हें जो बादशाहे इस्लाम के खिलाफ बगावत करने की वजह से अहले इस्लाम में छिड़ जाये…. मगर इस पर इत्तेफाक हे की यहाँ “فتن” बोल कर जंगें मुराद हें जैसा कि हाश्या ए नव्वी, उमदतुल कारी और मिरकात से वाज़ेह हे..

लिहाज़ा बड़े अदब के साथ अर्ज़ हे कि इस हदिष या इस जैसी अहादीष को कोरोना जैसी मोहलिक बिमारी और वबाए आम पर मुन्तबिक करना दुरुस्त नहीं हे न वायरस के ताअदिया को दुरुस्त मान कर उस से बचने की ताकीद के लिए और न कोरोना वाले मरीज़ की बिमारी का इन्फेक्शन लगने के अंदेशे की वजह से घर में बैठे रहने वालों को बेहतर बताना मुनासिब हे. मजहबे जमहूर व मन्सूर यही हे कि ताअदिया अमराज़ ख्वां कोई मर्ज़ हो मुतलकन बातिल हे ख्वां बितबअहा हो जैसा कि ज़माना ए जाहिलियत के लोगों का एतेक़ाद था या मुखालिफत व मदानात की वजह से ताअदिया माना जाये जैसा कि सैयदना अल्लामा तुरपशती, अल्लामा तैयबी, और अल्लामा अली कारी व इमाम नव्वी رحمۃ اللہ علیہم का मज़हब हे, बल्कि ताअदिया की हकीकत ही बातिल हे, जैसा कि,

लिहाज़ा वायरस की वजह से एक के मर्ज़ का दूसरे को लगने का क़ौल करना मज़हबे राजेह के खिलाफ हे.

हाँ ! एहतियाती तदाबिर इख्तियार करना और एसे मरीज़ से दूरी बनाए रखना भी हदिष से साबित हे ताके तंदुरस्त शख्स को जो एसे मरीज़ के वास मेल जोल रखता है, अगर बतकदीरे इलाही इब्तेदा (खुदा न ख्वास्ता) ये बिमारी लग जाए तो ताअदिया अमराज़ को वो सच समझने लगे और गुनाह में मुब्तला हो जाये. न ये के मरीज के इन्फेक्शन के खतरे से घर में बैठे रहने की तलकीन की जाये.

*✍🏻अल-जवाब: हज़रत अल्लामा मुफ़्ती मुहम्मद मुज़्ज़म्मिल बरकाती साहब किब्ला*
*_📬खादिम तदरिसो इफ्ता दारुल उलूम गौषे आज़म, पोरबंदर गुजरात_*

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